• Abhimanyu Kumar

सुविधाओं की बंजर धरती पर प्रतिभा के ये अंकुरण कब तक जीवित रह पाएंगे

जब-जब बिहार बोर्ड की मैट्रिक-इंटर परीक्षा के नतीजों की घोषणा होती है, कई सारी सफलता की कहानियां सामने आती हैं. कुछ प्रेरित करती हैं तो कुछ गौरवांवित.

ये कहानियां आभावों और तंगी पर जीत हासिल करने की होती हैं, विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की होती हैं. कीचड़ सने पैरों से मन में सपनों की उर्वरता से पनप रही सफलता की ऊंचाइयों को नापने की होती हैं.

हाल के वर्षों के नतीजों के ट्रेंड देखें तो यही मालूम होता है. खासकर बिहार बोर्ड का ट्रेंड तो यही रहा है. इस बार भी मैट्रिक की परीक्षा में कुछ गुदड़ी के लालों ने कमाल किया है. उनमें से एक नीतीश कुमार हैं.

नीतीश नालंदा जिला टॉपर हैं और मंगलवार को घोषित नतीजों में उन्हें 94 फ़ीसदी अंक मिले हैं. राज्य टॉपर हिमांशु राज से वह 11 यानी महज दो फ़ीसदी अंक पीछे हैं.

नीतीश नालंदा जिले के सिलाव प्रखंड के छोटकी वेलौर गांव में रहते हैं. यहां दलितों की आबादी रहती है. कमाऊ लोगों का यहां मुख्य पेशा ताड़ी बेचना है. ऑफ सीजन में जीवन यापन के लिए लोग यहां खेतों में मजदूरी भी करते हैं.

नीतीश के पिताजी प्रवासी मजदूर हैं. झारखंड में रह कर ताड़ी बेचते हैं. समय-समय पर मजदूरी भी करते हैं. मां घर संभालती हैं. 7 बाय 8 फीट के बिना प्लास्टर वाले दो कमरे वाले नीतीश के मकान में एक पुराना टीवी, एक पुराना स्टीरियो सिस्टम और एक बक्सा दिखा. बाथरूम जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी. कमरे के तुरंत बाहर एक चापाकल लगा था और उसी के पास एक तीन बाय तीन फीट का शौचालय.

संपत्ति के नाम पर घर के बाहर कुछ ताड़ के पेड़ और घर के अंदर खड़ी ईंट की अलमारियों पर रखी कुछ किताबें ही दिखीं. पहला पेट चलाने के लिए और दूसरा सपनों को पाने के लिए.

आर्थिक तंगी में जूझ रहे नीतीश बताते हैं कि उन्हें कई बार पैसों की वजह से पढ़ाई तक छोड़नी पड़ी. वे जिस सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं, वहां की पढ़ाई बहुत अच्छी तो नहीं है, पर इन सब को उन्होंने अपने सपनों के आगे आने नहीं दिया.

नीतीश कहते हैं, “भीमराव अम्बेडकर भी तो दलित थे, उनका परिवार कितना अमीर था? उन्होंने तो बहुत कुछ किया. हम भी गरीब हैं. दलित हैं. उनके जैसा नहीं बन पाएंगे पर कुछ तो बन ही जाएंगे. हमलोग चार भाई हैं, कमाने वाला सिर्फ एक है. पढ़ाई के अलावा क्या ही कर सकते हैं.”

पढ़ाई के प्रति नीतीश का यह जज्बा और छटपटाहट की झलक राज्य के अन्य टॉपरों में भी दिखती है. स्टेट टॉपर हिमांशु राज भी कमोबेश इसी तरह के बैकग्राउंड और समाज से आते हैं. उनके पिताजी सब्जी बेचते हैं. पटना जिला टॉपर समीक्षा कुमारी के पिताजी मजदूरी करते हैं.

राज्य में रोगजार नहीं है, उद्योग-धंधे न के बराबर हैं. ऐसे में बिहार के हर गरीब परिवार के लिए शिक्षा ही उनके उत्थान का एकमात्र जरिया है. खासकर दलित-पिछड़े समुदायों के लिए. यहां के मां-बाप हर जुगत लगा कर अपने बच्चों को इसलिए पढ़ाते हैं या उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं ताकि जो जिंदगी वे झेल रहे हैं, उनके बच्चे न झेलें.

नीतीश कहते हैं, “पढ़ाई के लिए शुरू से ही मेरे मां-बाप ने प्रोत्साहित किया है. बड़ा भाई भी 12वीं पास कर चुका है और हमलोग खानदान की पहली पीढ़ी हैं जो इतना पढ़े हैं.”

सरकार के दावे, बदले स्वरूप और ऑनलाइन होती शिक्षा व्यवस्था के दौर में नीतीश ने सेल्फ स्टडी को ही अपना हथियार बनाया. वे जिस सरकारी स्कूल में पढ़ते थे, वहां की व्यवस्था दुरुस्त नहीं है, इसलिए नीतीश 12 से 13 घंटे रोज पढ़ते थे.

उनके यहां तक पहुंचने में एक स्थानीय शिक्षक का भी हाथ है जो निजी कोचिंग चलाते हैं. नीतीश बताते हैं कि उनके शिक्षक ने उन्हें फ्री में पढ़ाया है, जिस वजह से वे यह सफलता हासिल कर पाए हैं. वे कहते हैं कि सिर्फ स्कूल के भरोसे अच्छा नंबर नहीं लाया जा सकता है.

बदहाल शिक्षा व्यवस्था से निकले ये नगीने

सरकारी बोर्ड के प्रमाणित टॉपर की ये बातें सरकार के दावों की पोल खोलती हैं. नीतीश सरकार अपने बजट का करीब 18 फीसदी खर्च शिक्षा पर करती है. देश में कम ही ऐसे राज्य हैं जो शिक्षा पर इतना खर्च करता है, फिर भी बिहार की बदहाल शिक्षा व्यवस्था से निकले ये नगीने गर्व का विषय हैं.

नीतीश के लिए यह सफलता का पहला पड़ाव है. उनका अब पूरा ध्यान आगे की पढ़ाई पर है. मैथ में 97 अंक लाने वाले नीतीश आईआईटी में पढ़ना चाहते हैं पर वे अपनी वास्तविक परिस्थितियों से भी वाकिफ हैं और कहते हैं कि यह सब संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि उनके पास उतने पैसे नहीं हैं. नीतीश को सरकारी मदद की भी उम्मीद कम दिखती हैं. वे कहते हैं कि अगर मदद मिली तो वे आईआईटी तक पहुंच कर दिखाएंगे.

आशंका और विश्वास की यह मिश्रित भावना नीतीश और उनके जैसे टॉपरों को कहां तक ले जाएगी, यह कहा नहीं जा सकता पर हर साल इसी तरह के बैकग्राउंड से निकले बच्चों की प्रतिभाएं सरकारी उदासी और आर्थिक तंगी में दम तोड़ देती हैं. बच्चे टॉपर तो बन जाते हैं पर आगे की राह में इतनी चुनौतियां होती हैं कि वो कहीं न कहीं हार मान लेते हैं.

आपको मेरी यह बात निगेटिविटी फैलाने और टॉपरों को हतोत्साहित करने वाली लग सकती है, लेकिन यह सच्चाई है और इस पर बात करना जरूरी है. इस मुद्दे को अगर हम समग्रता से देखें तो हम नीतीश जैसे नगीनों को खत्म होने से रोक सकते हैं.

ये हैं चुनौतियां

नीतीश और उनके जैसे टॉपरों के सामने अब बड़ी चुनौतियां आएंगी. ये चुनौतियां होंगी कट थ्रोट कॉम्पिटिशन की और हाव-भाव और शहरी होने के कॉन्फिडेंस की. बिहारी बच्चे पढ़ने में तो अच्छे जरूर होते हैं पर उनकी पर्सनैलिटी और कॉन्फिडेंस का उस तरीके से विकास नहीं किया जाता है, जिस तरीके से शहरी बच्चों का होता है. आखिरकार अंत में उनको भिड़ना इन्हीं बच्चों से होगा, सो तैयारी भी उसी स्तर की होनी चाहिए.

अक्सर समाज के अत्यंत निचले तबके से निकले दलित और पिछड़े समाज के ये बच्चे जब शहरों में कॉम्पिटिशन करने पहुंचते हैं तो उनका आधा कॉन्फिडेंस दूसरे बच्चों के पहनावे-ओढ़ावे और बोलचाल के सामने ही ध्वस्त हो जाता है. फिल्म सुपर 30 के एक दृश्य में भी इस तरह की स्थिति की व्याख्या की गई है. आनंद सर के बच्चे जब शहरी बच्चों से कॉम्पीट करने जाते हैं तो वे खुद को ऐसी ही स्थिति में पाते हैं. आप याद कीजिए फिल्म का वो गाना, ‘नो... नो... नो... बसंती नो डांस...’ यह गाना बच्चों के अंदर अपनी परिस्थिति और भाषा को लेकर पनपी हीन भावना को दर्शाता है और आनंद सर बच्चों की इन भावनाओं कोे दूर भी करते हैं.

बिहार में ऐसे लाखों टैलेंट हैं और हर टैलेंट को अपग्रेड करने के लिए एक आनंद सर काफी नहीं है. ऐसे कई आनंद सर समाज को चाहिए होंगे. बिहार की तकदीर बदलने के लिए ऐसे बच्चों को समाज और सरकार का साथ चाहिए, तभी हम बिहारी भविष्य में प्रवासी जैसे विशेषण से छुटकारा पा पाएंगे.

कोरोना संकट के दौरान जिस तरह की तस्वीरें सामने आई हैं, वे अंदर से द्रवित करती हैं. पूरी दुनिया कोरोना के संकट से जूझ रही है लेकिन बिहारियों को जो हाल हुआ है, वैसा किसी का नहीं हुआ. स्टेशनों पर पड़ी मां की लाश, भूख से ट्रेनों में दम तोड़ रहे लोग, पलायन की कीमत हजारों किलोमीटर पैदल चल कर अदा की जा रही है.

इन परिस्थितियों को भविष्य में आने से नीतीश और हिमांशु राज जैसे ही टॉपर रोक सकते हैं. ये हमारे समाज के नगीने हैं जिन्हें तराशने की जरूरत है. अगर इन्हें सही समय पर सही मार्गदर्शन और सहारा नहीं मिला तो निश्चित तौर पर ये आगे बढ़ तो जाएंगे पर दिल्ली के मुखर्जी नगर में साल-दो साल रहने के बाद वापस लौट आएंगे या छोटी-मोटी नौकरियां करने को मजबूर होंगे. आर्थिक और सामाजिक स्थितियां इन्हें ऐसा करने को मजबूर करेंगी.

क्या बिहार सरकार हर साल मैट्रिक-इंटर में करीब सौ-दो सौ ऐसे टैलेंट का जिम्मा उठाने की स्थिति में नहीं है? क्या इनके लिए कोई अलग से कार्यक्रम नहीं चलाया जाना चाहिए?

याद रखिए, ये चेंज एजेंट हैं अगर इन पर ध्यान दिया गया तो ये पूरा का पूरा दृश्य बदल सकते हैं.

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